सम्राट अशोक का महान इतिहास
प्रस्तुति-मोहिनी ठाकुर, इंटर्न, एटीएन नेटवर्क वर्ल्डवाइड
( चैत्र मास शुक्ल पक्ष की अष्टमी , 9 अप्रैल 2022 )
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सम्राट अशोक का महान इतिहास
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चक्रवर्ती सम्राट अशोक विश्वप्रसिद्ध एवं शक्तिशाली
भारतीय मौर्य राजवंश के महान सम्राट थे। सम्राट अशोक का पूरा नाम देवानांप्रिय अशोक मौर्य था। उनका राजकाल ईसा पूर्व 269 से, 232 प्राचीन भारत में था। मौर्य राजवंश के चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने अखण्ड भारत पर राज्य किया है तथा उनका मौर्य साम्राज्य उत्तर में हिन्दुकुश, तक्षशिला की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी, सुवर्णगिरी पहाड़ी के दक्षिण तथा मैसूर तक तथा पूर्व में बांग्लादेश, पाटलीपुत्र से पश्चिम में अफ़गानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान तक पहुँच गया था। सम्राट अशोक का साम्राज्य आज का सम्पूर्ण भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल,
बांग्लादेश, भूटान, म्यान्मार के अधिकांश भूभाग पर था, यह विशाल साम्राज्य उस समय तक से आज तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य रहा है। चक्रवर्ती सम्राट अशोक विश्व के सभी महान एवं शक्तिशाली सम्राटों एवं राजाओं की पंक्तियों में हमेशा शीर्ष स्थान पर ही रहे हैं। सम्राट अशोक ही भारत के सबसे शक्तिशाली एवं महान सम्राट है। सम्राट अशोक को "चक्रवर्ती सम्राट अशोक" कहा जाता है, जिसका अर्थ है - "सम्राटों के सम्राट" और यह स्थान भारत में केवल सम्राट अशोक को मिला है। सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य से बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भी जाना जाता है। सम्राट अशोक ने संपूर्ण एशिया में तथा अन्य आज के सभी महाद्विपों में भी बौद्ध पन्थ का प्रचार किया। सम्राट अशोक के सन्दर्भ के स्तम्भ एवं शिलालेख आज भी भारत के कई स्थानों पर दिखाई देते है। सम्राट अशोक प्रेम, सहिष्णूता, सत्य, अहिंसा एवं शाकाहारी जीवनप्रणाली के सच्चे समर्थक थे, इसलिए उनका नाम इतिहास में महान परोपकारी सम्राट के रूप में ही दर्ज हो चुका । यही नहीं उन्होंने नेपाल में महात्मा बुद्ध के जन्मस्थल लुम्बिनी में स्मारक के रुप में अशोक स्तंभ का निर्माण भी करवाया था।
तथ्य निम्नलिखित हैं :-
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(1) पूरा नाम – देवनांप्रियं चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान।
(2) अन्य नाम / उपाधियां – देवनांप्रियं, प्रियदर्शी, मगध का राजा, अशोक मौर्य, अशोकवर्धन और अशोक महान।
(3) जन्म - 304 ईसा पूर्व (संभावित), पाटलिपुत्र (पटना)
( चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को )
(4) पिता का नाम - राजा बिंदुसार
(5) माता का नाम - शुभद्रांगी ( महारानी धर्मा )
(6) पत्नी - रानी पद्मावती, तिश्यारक्षा, महारानी देवी, करुवकी नामक चार पत्नियाँ थीं।
(7) संतानें - कुणाल, महेंद्र, तीवल नामक तीन पुत्र एवं संघमित्रा तथा चारुमति नामक दो पुत्रियाँ ।
(8) तिवालावंश (Dynasty) - मौर्य वंश
(9) मृत्यु - 232 ईसा पूर्व, पाटलिपुत्र, पटना
(10) पूर्ववर्ती राजा - राजा बिंदुसार मौर्य
(11) उत्तरवर्ती राजा - दशरथ मौर्य
(12) शासन अवधि - 269 ई.पूर्व. से 232 ई.पूर्व.तक।
(1) सम्राट अशोक का बचपन –
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राजवंश परिवार में पैदा हुए सम्राट अशोक बचपन से ही बेहद प्रतिभावान और तीव्र बुद्धि के बालक थे। शुरु से ही उनके अंदर युद्ध और सैन्य कौशल के गुण दिखाई देने लगे थे, उनके इस गुण को निखारने के लिए उन्हें शाही प्रशिक्षण भी दिया गया था। इसके साथ ही सम्राट अशोक तीरंदाजी में ही शुरु से ही कुशल थे, इसलिए वे एक उच्च श्रेणी के शिकारी भी कहलाते थे।
भारतीय इतिहास के इस महान योद्धा के अंदर लकड़ी की एक छड़ी से ही एक शेर को मारने की अद्भुत क्षमता थी। सम्राट अशोक एक जिंदादिल शिकारी और साहसी योद्धा भी थे। उनके इसी गुणों के कारण उन्हें उस समय मौर्य साम्राज्य के अवन्ती में हो रहे दंगो को रोकने के लिये भेजा गया था।
सम्राट अशोक की विलक्षण प्रतिभा की वजह से ही वे बेहद कम उम्र में ही अपने पिता के राजकाज को संभालने लगे थे। वे अपनी प्रजा का भी बेहद ख्याल रखते थे। इसी वजह से वे अपने प्रजा के चहेते शासक भी थे। वहीं सम्राट अशोक की विलक्षण प्रतिभा और अच्छे सैन्य गुणों की वजह से उनके पिता बिन्दुसार भी उनसे बेहद प्रभावित थे, इसलिए उन्होंने सम्राट अशोक को बेहद कम उम्र में ही मौर्य वंश की राजगद्दी सौंप दी थी।
(2) सम्राट अशोक का शासनकाल एवं विशाल मौर्य सम्राज्य का विस्तार –
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जब अशोक के बडे़ भाई सुशीम अवन्ती की राजधानी उज्जैन के प्रांतपाल थे, उसी दौरान अवन्ती में हो रहे विद्रोह में भारतीय और यूनानी मूल के लोगों के बीच दंगा भड़क उठा, जिसको देखते हुए राजा बिन्दुसार ने अपने पुत्र अशोक को इस विद्रोह को दबाने के लिए भेजा, जिसके बाद अशोक ने अपनी कुशल रणनीति अपनाते हुए इस विद्रोह को शांत किया।
जिससे प्रभावित होकर राजा बिन्दुसार ने सम्राट अशोक को मौर्य वंश का शासक नियुक्त कर दिया गया। अवन्ती में हो रहे विद्रोह को दबाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद सम्राट अशोक को अवंती प्रांत के वायसराय के रुप में भी नियुक्त किया गया था। वहीं इस दौरान उनकी छवि एक कुशल राजनीतिज्ञ योद्धा के रुप में भी बन गई थी।
इसके बाद करीब 272 ईसा पूर्व में सम्राट अशोक के पिता बिंदुसार की मौत हो गई। वहीं इसके बाद सम्राट अशोक के राजा बनाए जाने को लेकर सम्राट अशोक और उनके सौतेले भाईयों के बीच घमासान युद्ध हुआ। इसी दौरान सम्राट अशोक की शादी विदिशा की बेहद सुंदर राजकुमारी शाक्या कुमारी से हुई।
शादी के बाद दोनों को महेन्द्र और संघमित्रा नाम की संतानें भी प्राप्त हुई। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक 268 ईसा पूर्व के दौरान मौर्य वंश के सम्राट अशोक ने अपने मौर्य सम्राज्य का विस्तार करने के लिए करीब 8 सालों तक युद्ध लड़ा। इस दौरान उन्होंने न सिर्फ भारत के सभी उपमहाद्धीपों तक मौर्य सम्राज्य का विस्तार किया, बल्कि भारत और ईरान की सीमा के साथ-साथ अफगानिस्तान के हिन्दूकश में भी मौर्य सम्राज्य का सिक्का चलवाया।
इसके अलावा महान अशोक ने दक्षिण के मैसूर, कर्नाटक और कृष्ण गोदावरी की घाटी में भी कब्जा किया। उनके सम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र (मगध, आज का बिहार) और साथ ही उपराजधानी तक्षशिला और उज्जैन भी थी। इस तरह सम्राट अशोक का शासन धीरे-धीरे बढ़ता ही चला गया और उनका सम्राज्य उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय सम्राज्य बना। हालांकि, सम्राट अशोक मौर्य सम्राज्य
का विस्तार तमिलनाडू, श्रीलंका और केरल में करने में नाकामयाब हुए।
(3) अशोका और कलिंगा घमासान युध्द –
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तक़रीबन 261 ईसापूर्व में भारतीय इतिहास के सबसे शक्तिशाली और ताकतवर योद्धा सम्राट अशोक ने अपने मौर्य सम्राज्य का विस्तार करने के लिए कलिंग (वर्तमान ओडिशा) राज्य पर आक्रमण कर दिया और इसके खिलाफ एक विध्वंशकारी युद्ध की घोषणा की थी। इस भीषण युद्ध में करीब 1 लाख लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई, मरने वालों में सबसे ज्यादा संख्या सैनिकों की थी। इसके साथ ही इस युद्ध में करीब डेढ़ लाख लोग बुरी तरह घायल हो गए। इस तरह सम्राट अशोक कलिंग पर अपना कब्जा जमाने वाले मौर्य वंश के सबसे पहले शासक तो बन गए, लेकिन इस युध्द में हुए भारी रक्तपात ने उन्हें हिलाकर रख दिया।
(4) कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक का ह्रद्य परिवर्तन एवं बौद्ध धर्म अपनाना –
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कलिंग युद्ध के विध्वंशकारी युद्ध में कई सैनिक, महिलाएं और मासूमों बच्चों की मौत एवं रोते-बिलखते घर परिवार देख सम्राट अशोक का ह्रद्य परिवर्तन हो गया। इसके बाद सम्राट अशोक ने सोचा कि यह सब लालच का दुष्परिणाम है साथ ही उन्होंने अपने जीवन में फिर कभी युध्द नहीं लड़ने का संकल्प लिया।
263 ईसा पूर्व में मौर्य वंश के शासक सम्राट अशोक ने धर्म परिवर्तन का मन बना लिया था। उन्होंने बौध्द धर्म अपना लिया एवं ईमानदारी, सच्चाई एवं शांति के पथ पर चलने की सीख ली और वे अहिंसा के पुजारी हो गये।
(5) बौद्ध धर्म के प्रचारक के रुप में सम्राट अशोक –
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बौद्ध धर्म अपनाने के बाद सम्राट अशोक एक महान शासक एवं एक धर्मपरायण योद्धा के रुप में सामने आए। इसके बाद उन्होंने अपने मौर्य सम्राज्य के सभी लोगों को अहिंसा का मार्ग अपनाने और भलाई कामों को करने की सलाह दी और उन्होंने खुद भी कई लोकहित के काम किए साथ ही उन्हें शिकार और पशु हत्या करना पूरी तरह छोड़ दिया। गरीबों एवं असहाय की सेवा की। इसके साथ ही जरूरतमंदों के इलाज के लिए अस्पताल खोला, एवं सड़कों का निर्माण करवाया यही नहीं सम्राट अशोक ने शिक्षा के प्रचार-प्रसार को लेकर 20 से भी ज्यादा विश्वविद्यालयों की नींव रखी।
ह्रद्यय परिवर्तन के बाद सम्राट अशोक ने सबसे पहले पूरे एशिया में बौध्द धर्म का जोरो-शोरों से प्रचार किया। इसके लिए उन्होंने कई धर्म ग्रंथों का सहारा लिया। इस दौरान सम्राट अशोक ने दक्षिण एशिया एवं मध्य एशिया में भगवान बुद्ध के अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए करीब 84 हजार स्तूपों का निर्माण भी कराया। जिनमें वाराणसी के पास स्थित सारनाथ एवं मध्यप्रदेश का सांची स्तूप काफी मशहूर हैं, जिसमें आज भी भगवान बुद्ध के अवशेषों को देखा जा सकता है। अशोका के अनुसार बुद्ध धर्म सामाजिक और राजनैतिक एकता वाला धर्म था। बुद्ध का प्रचार करने हेतु उन्होंने अपने राज्य में जगह-जगह पर भगवान गौतम बुद्ध की प्रतिमाएं स्थापित की। और बुद्ध धर्म का विकास करते चले गये। बौध्द धर्म को अशोक ने ही विश्व धर्म के रूप में मान्यता दिलाई।
बौध्द धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा तक को भिक्षु-भिक्षुणी के रूप में अशोक ने भारत के बाहर, नेपाल, अफगानिस्तान, मिस्त्र, सीरिया, यूनान, श्रीलंका आदि में भेजा। वहीं बौद्ध धर्म के प्रचारक के रुप में सबसे ज्यादा सफलता उनके बेटे महेन्द्र को मिली, महेन्द्र ने श्री लंका के राजा तिस्स को बौद्ध धर्म के उपदेशों के बारे में बताया, जिससे प्रभावित होकर उन्होंने बौद्ध धर्म को अपना राजधर्म बना दिया।
सार्वजानिक कल्याण के लिये उन्होंने जो कार्य किये वे तो इतिहास में अमर ही हो गये हैं। नैतिकता, उदारता एवं भाईचारे का संदेश देने वाले अशोक ने कई अनुपम भवनों तथा देश के कोने-कोने में स्तंभों एवं शिलालेखों का निर्माण भी कराया जिन पर बौध्द धर्म के संदेश अंकित थे।
(6) सम्राट अशोक मौर्य के शिलालेख
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भारत के महान शासक सम्राट अशोक मौर्य ने अपने जीवन में कई निर्माण कार्य कराए थे. सम्राट अशोक ने अपने जीवन में कई शिलालेख भी खुदवाये जिन्हें इतिहास में सम्राट अशोक के शिलालेखों के नाम से जाना जाता है. मौर्य वंश की पूरी जानकारी उनके द्वारा स्थापित इन्ही मौर्य वंश के शिलालेखों में मिलती है। सम्राट अशोक ने इन शिलालेखो को ईरानी शासक की प्रेरणा से खुदवाए थे. सम्राट अशोक के जीवनकाल के करीब 40 शिलालेख इतिहासकारों को मिले हैं जिसमे से कुछ शिलालेख तो भारत के बाहर जैसे अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, वर्तमान बांग्लादेश व पाकिस्तान इत्यादि देशों में मिले हैं. भारत में मौजूद सम्राट अशोक के शिलालेख एवं उनके नाम निम्नलिखित हैं –
शिलालेख - स्थान
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(1) रूपनाथ - जबलपुर ज़िला, मध्य प्रदेश ।
(2) बैराट - राजस्थान के जयपुर ज़िले में, यह शिला फलक कलकत्ता संग्रहालय में है ।
(3) मस्की - रायचूर ज़िला, कर्नाटक।
(4) येर्रागुडी - कर्नूल ज़िला, आंध्र प्रदेश ।
(5) जौगढ़ - गंजाम जिला, उड़ीसा
(6) धौली - पुरी जिला, उड़ीसा
(7) गुजर्रा - दतिया ज़िला, मध्य प्रदेश
(8) राजुलमंडगिरि - बल्लारी ज़िला, कर्नाटक
(9) गाधीमठ - रायचूर ज़िला, कर्नाटक
(10) ब्रह्मगिरि - चित्रदुर्ग ज़िला, कर्नाटक
(11) पल्किगुंडु - गवीमट के पास, रायचूर, कर्नाटक
(12) सहसराम - शाहाबाद ज़िला, बिहार
(13) सिद्धपुर - चित्रदुर्ग ज़िला, कर्नाटक
(14) जटिंगा - रामेश्वर चित्रदुर्ग ज़िला, कर्नाटक
(15) येर्रागुडी - कर्नूल ज़िला, आंध्र प्रदेश
(16) अहरौरा - मिर्ज़ापुर ज़िला, उत्तर प्रदेश
(17) दिल्ली - अमर कॉलोनी दिल्ली
(7) जम्बूदीप (भारत) में बौद्ध विश्वविद्यालय। विश्व गुरु अखण्ड भारत एवं गौतमबुद्ध दर्शन से सम्राट अशोक द्वारा बनवाए गए 18 विश्व शिक्षा केंद्र। 2200-2500 वर्ष पुराना।
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(1) नालंदा बौद्ध विश्वविद्यालय (बिहार)
(2) तक्षशिला विश्वविद्यालय (पाकिस्तान)
(3) गुंसिला महिला बौद्ध विश्वविद्यालय (बिहार)
(4) पुष्पागिरी बौद्ध विश्वविद्यालय (उड़ीसा)
(5) कांचीपुरम बौद्ध विश्वविद्यालय (तमिलनाडु)
(6) काशी बौद्ध विश्वविद्यालय (काशी)
(7) वल्लभी बौद्ध विश्वविद्यालय (गुजरात)
(8) विक्रमशिला बौद्ध विश्वविद्यालय (बिहार)
(9) समयेश बौद्ध विश्वविद्यालय (भोट, तिब्बत में मौजूद)
(10) जगदला बौद्ध विश्वविद्यालय (बांग्लादेश)
(11) सोमपुरा बौद्ध विश्वविद्यालय (बांग्लादेश)
(12) ओदंतपुरी बौद्ध विश्वविद्यालय (बिहार)
(13) मदुरै बौद्ध विश्वविद्यालय (तमिलनाडु)
(14) उज्जेन बौद्ध विश्वविद्यालय (मध्य प्रदेश)
(15) नागार्जुनकोंडा बौद्ध विश्वविद्यालय (आंध्र प्रदेश)
(16) पंडिता चैत्य बौद्ध विश्वविद्यालय (बांग्लादेश)
(17) नवदीप बौद्ध विश्वविद्यालय (पश्चिम बंगाल)
(18) तवांग बौद्ध विश्वविद्यालय (अरुणाचल प्रदेश)
नोट :- जब दुनिया पढ़ना लिखना शुरू कर रही थी तब ( जम्बूदीप यानी भारत में 18 विश्वविद्यालय थे )
( हमारा बौद्धमय भारत )
(8) "अशोक चक्र " एवं " शेरों की त्रिमूर्ति " – महान अशोक की देन
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भारत का राष्ट्रीय चिह्न "अशोक चक्र" तथा शेरों की " त्रिमूर्ति " भी अशोक महान की ही देंन है। ये कृतियां अशोक निर्मित स्तंभों और स्तूपों पर अंकित हैं। सम्राट अशोक का अशोक चक्र जिसे धर्म चक्र भी कहा जाता है, आज वह हमें भारतीय गणराज्य के तिरंगे के बीच में दिखाई देता है। " त्रिमूर्ति " सारनाथ (वाराणसी) के बौध्द स्तूप के स्तंभों पर निर्मित शिलामूर्तियों की प्रतिकृति है।
(9) सम्राट अशोक की मृत्यु –
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सम्राट अशोक ने करीब 40 सालों तक मौर्य वंश का शासन संभाला। करीब 232 ईसापूर्ऩ के आसपास उनकी मौत हो गई। ऐसा माना जाता है कि सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य वंश का सम्राज्य करीब 50 सालों तक चला। विश्व इतिहास में अशोक महान एक अतुलनीय चरित्र है। उनके जैसा ऐतिहासिक पात्र अन्यत्र दुर्लभ है। भारतीय इतिहास के अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य पश्चिमी और पूर्वी भाग में बँट गया। पश्चिमी भाग पर कुणाल
सभी देश वासियों को सम्राट अशोक जयंति की हार्दिक बधाई।
( चैत्र मास शुक्ल पक्ष की अष्टमी , 9 अप्रैल 2022 )
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सम्राट अशोक का महान इतिहास
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चक्रवर्ती सम्राट अशोक विश्वप्रसिद्ध एवं शक्तिशाली
भारतीय मौर्य राजवंश के महान सम्राट थे। सम्राट अशोक का पूरा नाम देवानांप्रिय अशोक मौर्य था। उनका राजकाल ईसा पूर्व 269 से, 232 प्राचीन भारत में था। मौर्य राजवंश के चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने अखण्ड भारत पर राज्य किया है तथा उनका मौर्य साम्राज्य उत्तर में हिन्दुकुश, तक्षशिला की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी, सुवर्णगिरी पहाड़ी के दक्षिण तथा मैसूर तक तथा पूर्व में बांग्लादेश, पाटलीपुत्र से पश्चिम में अफ़गानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान तक पहुँच गया था। सम्राट अशोक का साम्राज्य आज का सम्पूर्ण भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल,
बांग्लादेश, भूटान, म्यान्मार के अधिकांश भूभाग पर था, यह विशाल साम्राज्य उस समय तक से आज तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य रहा है। चक्रवर्ती सम्राट अशोक विश्व के सभी महान एवं शक्तिशाली सम्राटों एवं राजाओं की पंक्तियों में हमेशा शीर्ष स्थान पर ही रहे हैं। सम्राट अशोक ही भारत के सबसे शक्तिशाली एवं महान सम्राट है। सम्राट अशोक को "चक्रवर्ती सम्राट अशोक" कहा जाता है, जिसका अर्थ है - "सम्राटों के सम्राट" और यह स्थान भारत में केवल सम्राट अशोक को मिला है। सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य से बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भी जाना जाता है। सम्राट अशोक ने संपूर्ण एशिया में तथा अन्य आज के सभी महाद्विपों में भी बौद्ध पन्थ का प्रचार किया। सम्राट अशोक के सन्दर्भ के स्तम्भ एवं शिलालेख आज भी भारत के कई स्थानों पर दिखाई देते है। सम्राट अशोक प्रेम, सहिष्णूता, सत्य, अहिंसा एवं शाकाहारी जीवनप्रणाली के सच्चे समर्थक थे, इसलिए उनका नाम इतिहास में महान परोपकारी सम्राट के रूप में ही दर्ज हो चुका । यही नहीं उन्होंने नेपाल में महात्मा बुद्ध के जन्मस्थल लुम्बिनी में स्मारक के रुप में अशोक स्तंभ का निर्माण भी करवाया था।
तथ्य निम्नलिखित हैं :-
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(1) पूरा नाम – देवनांप्रियं चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान।
(2) अन्य नाम / उपाधियां – देवनांप्रियं, प्रियदर्शी, मगध का राजा, अशोक मौर्य, अशोकवर्धन और अशोक महान।
(3) जन्म - 304 ईसा पूर्व (संभावित), पाटलिपुत्र (पटना)
( चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को )
(4) पिता का नाम - राजा बिंदुसार
(5) माता का नाम - शुभद्रांगी ( महारानी धर्मा )
(6) पत्नी - रानी पद्मावती, तिश्यारक्षा, महारानी देवी, करुवकी नामक चार पत्नियाँ थीं।
(7) संतानें - कुणाल, महेंद्र, तीवल नामक तीन पुत्र एवं संघमित्रा तथा चारुमति नामक दो पुत्रियाँ ।
(8) तिवालावंश (Dynasty) - मौर्य वंश
(9) मृत्यु - 232 ईसा पूर्व, पाटलिपुत्र, पटना
(10) पूर्ववर्ती राजा - राजा बिंदुसार मौर्य
(11) उत्तरवर्ती राजा - दशरथ मौर्य
(12) शासन अवधि - 269 ई.पूर्व. से 232 ई.पूर्व.तक।
(1) सम्राट अशोक का बचपन –
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राजवंश परिवार में पैदा हुए सम्राट अशोक बचपन से ही बेहद प्रतिभावान और तीव्र बुद्धि के बालक थे। शुरु से ही उनके अंदर युद्ध और सैन्य कौशल के गुण दिखाई देने लगे थे, उनके इस गुण को निखारने के लिए उन्हें शाही प्रशिक्षण भी दिया गया था। इसके साथ ही सम्राट अशोक तीरंदाजी में ही शुरु से ही कुशल थे, इसलिए वे एक उच्च श्रेणी के शिकारी भी कहलाते थे।
भारतीय इतिहास के इस महान योद्धा के अंदर लकड़ी की एक छड़ी से ही एक शेर को मारने की अद्भुत क्षमता थी। सम्राट अशोक एक जिंदादिल शिकारी और साहसी योद्धा भी थे। उनके इसी गुणों के कारण उन्हें उस समय मौर्य साम्राज्य के अवन्ती में हो रहे दंगो को रोकने के लिये भेजा गया था।
सम्राट अशोक की विलक्षण प्रतिभा की वजह से ही वे बेहद कम उम्र में ही अपने पिता के राजकाज को संभालने लगे थे। वे अपनी प्रजा का भी बेहद ख्याल रखते थे। इसी वजह से वे अपने प्रजा के चहेते शासक भी थे। वहीं सम्राट अशोक की विलक्षण प्रतिभा और अच्छे सैन्य गुणों की वजह से उनके पिता बिन्दुसार भी उनसे बेहद प्रभावित थे, इसलिए उन्होंने सम्राट अशोक को बेहद कम उम्र में ही मौर्य वंश की राजगद्दी सौंप दी थी।
(2) सम्राट अशोक का शासनकाल एवं विशाल मौर्य सम्राज्य का विस्तार –
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जब अशोक के बडे़ भाई सुशीम अवन्ती की राजधानी उज्जैन के प्रांतपाल थे, उसी दौरान अवन्ती में हो रहे विद्रोह में भारतीय और यूनानी मूल के लोगों के बीच दंगा भड़क उठा, जिसको देखते हुए राजा बिन्दुसार ने अपने पुत्र अशोक को इस विद्रोह को दबाने के लिए भेजा, जिसके बाद अशोक ने अपनी कुशल रणनीति अपनाते हुए इस विद्रोह को शांत किया।
जिससे प्रभावित होकर राजा बिन्दुसार ने सम्राट अशोक को मौर्य वंश का शासक नियुक्त कर दिया गया। अवन्ती में हो रहे विद्रोह को दबाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद सम्राट अशोक को अवंती प्रांत के वायसराय के रुप में भी नियुक्त किया गया था। वहीं इस दौरान उनकी छवि एक कुशल राजनीतिज्ञ योद्धा के रुप में भी बन गई थी।
इसके बाद करीब 272 ईसा पूर्व में सम्राट अशोक के पिता बिंदुसार की मौत हो गई। वहीं इसके बाद सम्राट अशोक के राजा बनाए जाने को लेकर सम्राट अशोक और उनके सौतेले भाईयों के बीच घमासान युद्ध हुआ। इसी दौरान सम्राट अशोक की शादी विदिशा की बेहद सुंदर राजकुमारी शाक्या कुमारी से हुई।
शादी के बाद दोनों को महेन्द्र और संघमित्रा नाम की संतानें भी प्राप्त हुई। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक 268 ईसा पूर्व के दौरान मौर्य वंश के सम्राट अशोक ने अपने मौर्य सम्राज्य का विस्तार करने के लिए करीब 8 सालों तक युद्ध लड़ा। इस दौरान उन्होंने न सिर्फ भारत के सभी उपमहाद्धीपों तक मौर्य सम्राज्य का विस्तार किया, बल्कि भारत और ईरान की सीमा के साथ-साथ अफगानिस्तान के हिन्दूकश में भी मौर्य सम्राज्य का सिक्का चलवाया।
इसके अलावा महान अशोक ने दक्षिण के मैसूर, कर्नाटक और कृष्ण गोदावरी की घाटी में भी कब्जा किया। उनके सम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र (मगध, आज का बिहार) और साथ ही उपराजधानी तक्षशिला और उज्जैन भी थी। इस तरह सम्राट अशोक का शासन धीरे-धीरे बढ़ता ही चला गया और उनका सम्राज्य उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय सम्राज्य बना। हालांकि, सम्राट अशोक मौर्य सम्राज्य
का विस्तार तमिलनाडू, श्रीलंका और केरल में करने में नाकामयाब हुए।
(3) अशोका और कलिंगा घमासान युध्द –
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तक़रीबन 261 ईसापूर्व में भारतीय इतिहास के सबसे शक्तिशाली और ताकतवर योद्धा सम्राट अशोक ने अपने मौर्य सम्राज्य का विस्तार करने के लिए कलिंग (वर्तमान ओडिशा) राज्य पर आक्रमण कर दिया और इसके खिलाफ एक विध्वंशकारी युद्ध की घोषणा की थी। इस भीषण युद्ध में करीब 1 लाख लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई, मरने वालों में सबसे ज्यादा संख्या सैनिकों की थी। इसके साथ ही इस युद्ध में करीब डेढ़ लाख लोग बुरी तरह घायल हो गए। इस तरह सम्राट अशोक कलिंग पर अपना कब्जा जमाने वाले मौर्य वंश के सबसे पहले शासक तो बन गए, लेकिन इस युध्द में हुए भारी रक्तपात ने उन्हें हिलाकर रख दिया।
(4) कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक का ह्रद्य परिवर्तन एवं बौद्ध धर्म अपनाना –
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कलिंग युद्ध के विध्वंशकारी युद्ध में कई सैनिक, महिलाएं और मासूमों बच्चों की मौत एवं रोते-बिलखते घर परिवार देख सम्राट अशोक का ह्रद्य परिवर्तन हो गया। इसके बाद सम्राट अशोक ने सोचा कि यह सब लालच का दुष्परिणाम है साथ ही उन्होंने अपने जीवन में फिर कभी युध्द नहीं लड़ने का संकल्प लिया।
263 ईसा पूर्व में मौर्य वंश के शासक सम्राट अशोक ने धर्म परिवर्तन का मन बना लिया था। उन्होंने बौध्द धर्म अपना लिया एवं ईमानदारी, सच्चाई एवं शांति के पथ पर चलने की सीख ली और वे अहिंसा के पुजारी हो गये।
(5) बौद्ध धर्म के प्रचारक करता था, जबकि पूर्वी भाग पर सम्प्रति का शासन था। लेकिन १८० ई. पू. तक पश्चिमी भाग पर बैक्ट्रिया यूनानी का पूर्ण अधिकार हो गया था। पूर्वी भाग पर वृहद्रथ का राज्य था। वह मौर्य वंश का अन्तिम शासक है।
बड़े दुख की बात है जिन नागरिकों को यह महत्वपूर्ण जयंति मनानी चाहिए वो अपना इतिहास ही भुला बैठे हैं और जो जानते हैं वो ना जाने क्यों मनाना नहीं चाहते ???
आइए हम सब मिल कर इस ऐतिहासिक भूल को सही करने का हर संभव प्रयास करें। प्रयास करें कि अपने संस्थानों में आज 09 अप्रैल , " सम्राट अशोक जयंति " के रूप में, सम्मान व उत्साह के साथ मनाया जाए।
जय भीम नमो बुद्धाय। जय विज्ञान जय संविधान।
संकलनकर्ता, संयोजक एवं निवेदक -
डाॅ सच्चितानन्द चौधरी "शशि"
प्रयागराज, उत्तरप्रदेश।
दिनांक- 09/04/2022

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